जैजैपुर/सक्ती।
जैजैपुर थाना क्षेत्र में एक विधवा महिला के पुश्तैनी मकान और जमीन से जुड़े विवाद ने पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायतकर्ता श्रीमती मनोरमा चंद्रा का आरोप है कि विवाद, कथित गाली-गलौज, धमकी और मकान पर कब्जे के प्रयास को लेकर बार-बार शिकायत देने के बावजूद पुलिस द्वारा अब तक प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई। महिला पक्ष का कहना है कि मामले को लगातार राजस्व विवाद बताकर पुलिस कार्रवाई से बच रही है।
महिला के अनुसार, विवादित भूमि को लेकर तहसीलदार और एसडीएम स्तर पर स्थगन आदेश पारित हो चुके हैं। इसके बावजूद विवादित मकान में कथित रूप से हस्तक्षेप और कब्जे का प्रयास जारी है। महिला पक्ष ने आरोप लगाया है कि बंटी साहू उर्फ अमृत लाल साहू, उनकी पत्नी सुनीता साहू, कैलाश देवांगन तथा अन्य लोगों द्वारा कथित रूप से गाली-गलौज कर केस वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है। ऐसे आरोपों के बावजूद पुलिस द्वारा प्राथमिकी दर्ज न करना और शिकायतों को केवल राजस्व विवाद बताकर टालना कानून-व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है। यदि किसी महिला को धमकी, दबाव या जबरन कब्जे का सामना करना पड़ रहा है, तो पुलिस का पहला दायित्व उसकी शिकायत दर्ज कर सुरक्षा देना है, न कि उसे कार्यालयों के चक्कर लगाने के लिए मजबूर करना।

महिला पक्ष का यह भी आरोप है कि विवादित मकान में पूर्व में चोरी की घटनाएं हुई हैं तथा महिला के सास-ससुर से जुड़ी हत्या की गंभीर घटना भी इसी मकान से संबंधित रही है। महिला का कहना है कि पूर्व की घटनाओं में अब तक अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने तथा मामले की फाइल बंद होने की स्थिति के कारण उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर आशंका है। यदि यह आरोप सही हैं, तो पुलिस की निष्क्रियता और भी गंभीर मानी जाएगी। किसी संवेदनशील मामले में पुराने रिकॉर्ड, शिकायतों और घटनाओं की निष्पक्ष समीक्षा किए बिना फाइल बंद कर देना पीड़ित पक्ष के साथ अन्याय है। पुलिस प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि पूर्व की शिकायतों पर क्या जांच हुई, किन अधिकारियों ने कार्रवाई की और किन आधारों पर मामला बंद किया गया।

वहीं, 18 अगस्त 2026 को विवाद की स्थिति बनने पर महिला द्वारा 112 पर पुलिस सहायता मांगे जाने की बात सामने आई है। घटनास्थल पर मौजूद पत्रकार मनोज चंद्रा का आरोप है कि घटना की वीडियो रिकॉर्डिंग के दौरान थाना प्रभारी राकेश राठौर द्वारा उनका मोबाइल अपने कब्जे में लेकर उन्हें थाने ले जाया गया। उनका दावा है कि बाद में मोबाइल में मौजूद घटना से संबंधित महत्वपूर्ण वीडियो उपलब्ध नहीं रहा। यदि किसी पत्रकार का मोबाइल जब्त किया गया और उसमें मौजूद साक्ष्य बाद में नहीं मिले, तो यह पुलिस प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न है। ऐसी स्थिति में मोबाइल जब्ती की लिखित कार्रवाई, पंचनामा, तकनीकी जांच और वीडियो की सुरक्षा से जुड़े सभी तथ्यों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
मनोज चंद्रा के विरुद्ध जैजैपुर थाना पुलिस द्वारा BNSS की धाराओं 170/126 एवं 135/3 के तहत की गई कार्रवाई को लेकर भी निष्पक्षता की मांग उठाई गई है। शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि मूल विवाद और कथित धमकियों पर कार्रवाई करने के बजाय पुलिस ने उलटे शिकायत से जुड़े व्यक्ति पर ही कार्रवाई कर दी। यदि ऐसा हुआ है, तो यह पुलिस की पक्षपातपूर्ण कार्यशैली का उदाहरण माना जाएगा। कानून का उद्देश्य पीड़ित को दबाना नहीं, बल्कि उसे न्याय दिलाना है।

महिला पक्ष ने पुलिस अधीक्षक सक्ती श्री प्रफुल ठाकुर जी से वरिष्ठ अधिकारी के माध्यम से निष्पक्ष जांच, शिकायतों पर कार्रवाई, स्थगन आदेश के पालन की जांच तथा सुरक्षा उपलब्ध कराने की मांग की है। महिला का कहना है कि शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होने से उन्हें किसी अप्रिय घटना की आशंका बनी हुई है। पुलिस प्रशासन को इस मामले में तत्काल स्वतंत्र जांच करानी चाहिए, शिकायतों पर FIR दर्ज करने के संबंध में स्पष्ट निर्णय लेना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी पक्ष को कानून हाथ में लेने का अवसर न मिले। निष्पक्ष जांच में देरी पुलिस पर जनता का भरोसा और कमजोर करेगी।







